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वराहमिहिर का भू-जल विज्ञान

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05-10-2019

भारतीय आदिमानव की प्रारंभिक जद्दोजहद का केन्द्र बिन्दु निश्चित ही भोजन, पानी और सुरक्षित ठिकाने तक ही सीमित रहा होगा। इस परिपेक्ष्य में यह अनुमान किसी हद तक सही हो सकता है कि इन आदिमानवों ने अपनी बस्तियाँ इन्ही जरूरतों को पूरा करने वाले स्थानों के निकट ही बसाई होंगी। शायद इसलिये कहा जाता है कि मानव सभ्यता का विकास, नदियों के किनारे प्रारंभ हुआ। जद्दोजहद का दूसरा महत्वपूर्ण बिन्दु भारत की बरसात का चरित्र रहा होगा। इसलिये, जब उनकी बस्तियों का नदियों से दूर बनाना शुरू हुआ होगा, तब निश्चित ही, आदिमानव ने पानी की खोज के दायरे को व्यापक बनाया होगा और ज्ञात जल स्त्रोतों (बारहमासी नदी और प्राकृतिक झरनों) के पानी के अलावा, जमीन के नीचे के भूमिगत पानी की खोज की नींव रखी होगी और उपयुक्त स्थानों तथा संरचनाओं के बारे में सोचना प्रारंभ किया होगा। भारतवर्ष में भू.गर्भ के जल का पता लगाने का इतिहास लगभग 5000 साल पुराना है। संभव है, प्राकृतिक झरनों और रेगिस्तान के मरूद्यानों ने उस काल के विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया हो और विकसित समझ ने जमीन के नीचे के पानी की खोज को दिशा दी हो। पर यह तय है कि अनेकानेक सालों तक समग्र प्रयास चलते रहे होंगे तथा अनेक प्रयोग में अवलोकनों की मदद से परिणामों को देखा, समझा और परखा गया होगा और परिणामों की सतत् समीक्षा की मदद से निष्कर्षों को और सटीक बनाया होगा। देश के विभिन्न भागों में यह प्रक्रिया लगातार चलती रही होगी और अनेक विद्वानों ने वर्षों तक रात-दिन मेहनत की होगी। यह सही है कि, वराहमिहिर के पहले किसी भी प्राचीन विद्वान का इस विषय पर कोई भी हस्तलिखित ग्रन्थ नहीं मिला है। वरामिहिर द्वारा लिखित ग्रन्थ वृहत्संहिता है। वृहत्संहिता मूल रूप से ज्योतिष का ग्रन्थ है। यह संभव है कि आने वाले दिनों में कहीं ऐसा हस्तलिखित ग्रन्थ मिले, जमीन के नीचे के पानी की खोज के बारे में उपलब्ध परम्परागत जानकारियों में सुधार करे।

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